सियासत
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"सियासत"
.....पांच विधान सभाओं के चुनाव परिणाम 11 दिसम्बर को आने वाले है लेकिन इस परिणाम से कोई परिवर्तन
दिखेगा ऐसा मुगालता कमसे कम जागरूक लोग तो नहीं
ही पाल रहे है ।
2019 के आम चुनाव किभी डुगडुगी बजने वाली है । विडंबना ही कहीं जाएगी की इससे भी कोई उम्मीद
नहीं की जानी चाहिए ।
सांप नाथ हार गए तो नागनाथ जीत जाएंगे ।
जीत हार चाहे जिसकी हो सिस्टम वहीं रहेगा ।
(१) क्या किसी गरीब को बिना घूस दिए निर्बल
आवास , लाल राशन कार्ड बन जाएगा ?
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(२) जाति वाद , सांप्रदायिकता , सच्चा हिन्दू
कच्चा हिन्दू , पक्का धर्म निर्पेक्ष ,
अलपसंख्यकों के तुष्टि कारण की होड़
क्या नज़र नहीं आएगी ?
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(३) क्या आय से अधिक संपत्ति , ताज
कारी डोर , राफाल , व्यापम , फर्जी
नियुक्ति , पर्चा आऊट , नियुक्ति में
सोर्स , फोर्स ,भाई भतीजा वाद आदि
मसले काम होजाएंगे ?
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सिध्यांत विहीन राजनीति के इस दौर में सबसे
बड़ी समस्या राजनीतिक दलों को अपने को साबित
करने की है । इस संकठ से भाजपा , कांग्रेस कुछ ज्यादा ही जूझ रही है । श्री राम भक्त कौन ज्यादा है
इसे साबित करने के लिए रोज नए नए तरीके इजाद
हो रहे है ।
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..........कैसे कैसे " दृष्टि पत्र " या " संकल्प "
पत्र में जनता को लुभाने के लिए
अजब गजब वायदे हो रहे है ।
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अजब अजब " क्षेत्रीय दलों की घोषणाएं " .........?
चन्द्र बाबू नायडू , ममता बनर्जी , महबूबा मुफ्ती , विहार के कुसवाहा जी , यूपी के राजभर जी
अखिलेश बाबू , बहन जी , वामपंथी जी , प्रगतिशील
लोग , पी आई एल दाखिल करने वाले अपनी अपनी
ढपली अपने अपने राग से बजाते समय हम लोगो
को वोट बैंक के सिवाय कुछ नहीं समझते ।
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परिवार वाद से ग्रसित सभी राजनीतिक दलों के
पास अपने अपने तर्क है ।
मसलन .......पंकज सिंह जी को नोएडा की
जनता ने चुना है ...हम क्या उखाड़ लेगे ?
अखिलेश बाबू , को जनता चुनती है ?
ऐसे ही अनेक उदाहरण गिनाए जा सकते है ।
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तरस आती है उन युवाओं पर जो अपने घर अपने
माता पिता के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक दलों
के लिए पूरा समय दे रहे है ।
( १) .. अब युवक अपने लिए काम करे ।
अपने घर , समाज , मित्रों , पड़ोसियों
गली मोहल्ले , देश हित में काम करे ।
(२) यदि आपके घर का कोई स्थापित राजनीति
में प्रभावी नहीं है तो आपको राजनीति
करना बालू में मूतने के बराबर है ।
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प्रस्तुति: भोला नाथ मिश्र , पत्रकार (स्वतंत्र )
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