उदहारण - कहानी


                    उदाहरण......

विद्यालय के नए भवन के उद्घाटन का दिन है पूरे परिसर में प्रात: काल से ही एक हलचल सी मची हुई है . वर्मा जी चारों ओर चक्कर काट काट कर मानो फिरकी हुए जा रहे हैं, आखिर संयोजक के नाते कार्यक्रम के सफल सम्पादन का दायित्व उनके सन से सफ़ेद बालों वाले सर पर जो था .            कभीं सजावट-साउंड वाले डबलू को मीठी डांट तो कभी स्कूल के वालेंटियर छात्रो को समझाते , दूर खड़े प्रधानाचार्य जी यह दृश्य देख आश्वस्त से मुस्कुराते हैं तो वर्मा जी वैसा ही प्रतिउत्तर दे कर और भी आश्वस्त कर देते हैं .       
                                           
धीरे-धीरे तैयारी अपनी पूर्णता की ओर पहुँच गयी या यूं कहें कि जैसे बरात आ जाती है तो लड़की पक्ष द्वारा की जा रही सम्पूर्ण तैयारी पूर्ण मान ली जाती है वैसे ही मुख्यअतिथि का सरकारी वाहन प्रांगण में आता दिखा समस्त तैयारी पूर्ण मान ली गयी.                                            प्रधानाचार्य जी अगवानी को तो वर्मा जी स्वागत गान के लिए छात्राओं  की ओर लपक गए , संगीता मैडम और आरती मैडम मेकप रूम की ओर बढ़ गयी बाकी के अध्यापक भी अपनी अपनी ड्यूटी पर सज्ज हो गए .नेता टाइप के अभिभावक और एक दो वरिष्ट अध्यापक वर्मा जी के कान में माल्यार्पण और बैज लागने के लिए खुशामद भिडाने लगे.   
                                                 
               उधर हेड साहब गाड़ी के पास पहुँच कर मुख्यअतिथि जिलाधिकारी जे. कुमार का स्वागत किया कोई अट्ठाईस साल का नौजवान हल्के भूरे रंग का सफ़ारी सूट पहन कर बाहर निकला दाहीने हाथ में बैसाखी लिए चहरे पर मुस्कान और आँखों में ग़जब का आत्मविश्वास  अभिवादन का प्रतिउत्तर देते हुए सामने दिख रहे मंच की ओर अपनी विशिष्ट चाल से बढ़ चला .

मंच के पास पहुचते ही छात्रवों ने पारम्परिक स्वागत किया और स्वगाताकांक्षी लोगों ने दो माला से ही बारी-बारी जिलाधिकारी महोदय के गले में डाल निकाल कर संतोष किया. फिर बलिकावों ने स्वागत गान गाना सुरू किया,  इधर  वर्मा जी को जानें क्यों मुख्य अतिथि का चेहरा कुछ पहचाना सा लग रहा था और वो भी तो  हाँथ जोड़ कर अभिवादन करने के बाद से लगातार देख कर मुस्कुरा रहे थे स्वागत गान के उपरांत वर्मा जी ने मंच से नए भवन का फीता काटने का आग्रह किया और अतिथियों का समूह नए भवन की ओर बढ़ गया और जल्दी ही औपचारिकता पूरी करके पुन: जिलाधिकारी महोदय प्रधानाचार्य जी के साथ मंच के नीचे प्रथम पंक्ति में बैठ गए.

वर्मा जी को पुन: वो चेहरा पहचाना सा लग रहा था 58 की उमर में उनकी यदाद्स्त सायद बहुत तेज नहीं थी कुछ याद ही नहीं आरहा था .
कार्यक्रम के क्रम में रस्मी भाषण देने के लिए मंच से वर्मा सर ने आग्रह किया और पुन: विशिष्ट चाल में चलते हुए जिलाधिकारी  महोदय मंच पर पहुंचे और झुक कर वर्मा जी के पैर छू लिए आर बोले- ‘गुरूजी बस बाल सफ़ेद हो गए हैं बाकी आप वैसे ही हैं अभीं भी’.
वर्मा जी अचकचा गए तो बाकी लोग हतप्रभ से निहारते रहे.  ‘कौन ? तुम जगत ?’  वर्मा जी को याद आया. जी गुरु जी 11 –B .
‘बालों के साथ साथ यादास्त पर भी असर पड़ गया है बेटा’ – वर्मा जी भूल गए कि वो जिले के सबसे बड़े हाकिम से बात कर रहे हैं और जगत को भी कहाँ याद था वो तो 11वी का छात्र था इस क्षण और वर्मा जी भी वहीँ समझ रहे थे, अगले पल में जिलाधिकारी ने माइक सभाली – ‘प्रधानाचार्य जी , आदरणीय गुरु देव वर्मा सर ....’

और वर्मा जी के आँखों के आगे गुज़री बातें चित्र पट सी चलने लगी .
जुलाई- अगस्त का महीना था वर्मा जी विद्यालय में नए नए आए थे शिक्षकों से तो मेल-मिलाप हो गया था और छात्रो को भी थोड़ा थोड़ा पहचानने लगे थे उन्होंने गौर किया कि उनकी कक्षा का एक छात्र बहुत दिनोसे अनुपस्थित है सहपाठियों से पता लगा कि उसकी पस्थिति काफी कम रहती है .
उन दिनों उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में फोन आदि की ऐसी सुविधाएं नहीं थी अत: बच्चों से सन्देश दिलवाया और अगले दिन वो बच्चा जगत कुमार आया , हाँथ में बैसाखी पकडे झिझकता और शर्माता सा एक ब्रेंच पर ढेर हो गया थोड़ी बहुत बात करने से पता लगा कि छात्र प्रतिभाशाली फ़ुटबाल खिलाड़ी था लेकिन दुर्घटना में पैर गवाने के बाद उसका आत्मविश्वास जाता रहा समाज से कटा सा रहने लगा माँ-बाप छोटे किसान थे .
उसका मन न तो विद्यालय में लगता न पुस्तकों की ओर देखनें का ही मन करता उसका सपना तो फ़ुटबाल था जो अब हवा हो चूका था.

खेल की घंटी में जब सब बच्चे मैदान पर पहुंचे तो एक कोनें की बेंच पे बैठे जतिन को देख कर वर्मा जी उसके पास पहुंच गए उसका हाल चाल पूछ कर धीरे-धीरे उसके मन की गांठें टटोलने लगे फिर तो ये अक्सर का क्रम हो गया वर्मा जी जतिन को कहानिया और कवितायेँ सुनाते और कब जतिन के झिझक के दरवाजे खोल गए ये दोनों नहीं जान पाए आखिर जतिन ने वर्मा जी से कहा ‘‘ लोग कहते हैं मेरा पूर्व जन्म का कर्म था जो झेलना पड़ रहा है , हमें तो बस बोझ सी जिंदगी बस कटनी है सर क्या करें मै दूसरों की दया पर निर्भर हूँ मेरा तो अब कोई सपना ही नहीं रहा’’                                                                                                                   आँखों से अंशू और शब्दों से उसके उदगार बह गए .
वर्मा जी ने धीरे से कंधे पर हाँथ रखा और उसकी आँखों में झांकते हुए  बोले ‘‘पैरों से नहीं बेटा हौशलों से आगे बढ़ा जाता है, जाने कितनें लोग जिन्हें समाज ने असक्षम समझा आत्म बल से आगे बढ़ गए और समाज उनके आगे नतमस्तक हुआ ध्यान रखो एक रास्ता बंद होता है तो दस खुलते हैं सोचो और उन्हें ढूढों फूटबाल नहीं तो कुछ और सही अपनी विशेषता को कमजोरी नहीं ताकत बनावो, खेल में भाग नहीं ले सकते ,दोस्त नहीं है ,एकांत पसंद है ,तो किताबो के साथ दोस्ती करो’’.
चकित से जगत के बोल फूटे ‘लेकिन सर कैसे ? कोई उदाहरण है जिसने ऐसा किया हो ?’

वर्मा जी मुस्कुरा कर – ‘बहुत से हैं बेटे किताबों से दोस्ती करो तो पता लगेगा और हाँ अब मेरा एक सपना है कि तुम खुद उदहारण बनों भारतीय प्रसासनिक सेवा भारत की सबसे बड़ी परीक्षा है वो तुम्हे एक दिन पास करना है ये मेरा सपना था इसे तुम पूरा करो बेटा.’
अचानक तालियों की गड़गड़ाहट से वर्मा सर की तन्द्रा टूटी जगत कुमार का भाषण समाप्त हो चूका था लोग वर्मा जी की ओर गर्व से देख रहे थे और वर्मा जी जगत कुमार की ओर बस देखे जा रहे थे जैसे आज वर्मा जी ही आई एस अफसर बन गए हों .......
-             
        - 

          विधुभूषण   
     9455667248

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

ललका गुलाब - कहानी

बिखर गया पर्सियन साम्राज्य कब जागेंगे हिंदू ?